योग (yog explained)

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योग (yog explained in hindi):

आज पूरी दुनिया में योग करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है किंतु, योग का वास्तविक महत्त्व कदाचित् कुछ लोगों को ही पता है| अधिकतर लोगों का मानना है कि, योग एक शारीरिक क्रिया है जिसे, निरोगी रहने के लिए अपनाया जाता है लेकिन, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो, योग के माध्यम से चमत्कारी शक्तियां प्राप्त होने का दावा करते हैं| इसमें कोई संदेह नहीं कि, योग मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है किंतु, जिस उद्देश्य से योग किया जा रहा है, उसका दायरा अति संकुचित है अर्थात योग, अंतरात्मा से जुड़ने की प्रक्रिया है| जिसके लिए शारीरिक और मानसिक उर्जा की आवश्यकता होती है लेकिन, आम भाषा में योग विभिन्न आसनों की सहायता से व्यायाम करना ही होता है जिससे, योग एक व्यापार बन चुका है हालाँकि, इसमें कोई बुराई नहीं किंतु, जब कोई ज्ञान अपने श्रेष्ठतम उद्देश्य तक न पहुँचे तो, यह विद्या का तिरस्कार ही होता है| योग के रहस्यमयी ज्ञान को निम्नलिखित बिन्दुओं से में स्पष्ट किया गया है|

  1. योग क्या है?
  2. क्या योग से कुछ होगा?
  3. अष्टांग योग क्या है?
  4. योग से क्या हानि है?
  5. योग शक्ति कैसे प्राप्त करें?
अंतरात्मा से जुड़ने की प्रक्रिया: process of connecting with conscience?
Image by EnergieDeVie from Pixabay

योग की शक्ति उसके ज्ञान में छिपी हुई है| वास्तविक योग अहंकार का सत्य में विलय होता है| केवल शारीरिक क्रियाओं को योग नहीं कहा जाता| वस्तुतः योगासन में उपयोग की जाने वाली शारीरिक क्रियाएं, मन को एकाग्र करने के लिए आवश्यक है| इसका अर्थ यह नहीं कि, इसे अंतिम बिंदु मान लिया जाए| चूँकि, मनुष्य का मन चंचल होता है और जब तक वह अपने मन को स्थिर करना न सीख ले तब तक, उसे आध्यात्मिक ज्ञान दे पाना असंभव है| प्रत्येक मनुष्य अपने अतीत की जानकारियों के आधार पर, स्वयं को ज्ञानी समझता | अतः अहंकार भाव प्रबल हो जाता है जिससे, मनुष्य अपने पूर्वाग्रह को सत्य समझने लगता है जो, उसे झूठे सुख दुख के चक्रव्यूह में उलझा देते हैं, इसलिए योगासन लाभकारी होते हैं| सांसारिक विषय वस्तुओं के ज्ञान को आध्यात्मिक ज्ञान से नहीं जोड़ा जा सकता, दोनों का क्षेत्र विभिन्न है| योग का स्पष्टीकरण विज्ञान के दायरे के बाहर की बात है जिसे, निम्नलिखित बिंदुओं से समझने का प्रयत्न करते हैं|

योग क्या है?

योग क्या हैः what is yoga?
Image by Okan Caliskan from Pixabay

योग का शाब्दिक अर्थ होता है, मेल या समागम अर्थात मनुष्य का अपनी अंतरात्मा से मिलन ही, वास्तविक योग कहलाता है| योग के कई माध्यम है| जैसे- भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग इत्यादि| वस्तुतः योग को लेकर बहुत सी भ्रांतियां फैली हुई है जिसमें. शारीरिक स्वास्थ्य को योग से जोड़कर देखा जाता है जो, अपूर्ण सत्य है| योग में उपयोग की जाने वाली शारीरिक क्रियाएं, केवल हठयोग का प्रारंभ मात्र हैं| इसका उद्देश्य शारीरिक बलिष्ठता नहीं बल्कि, मन की चंचलता को विराम देना है| मनुष्य का मन उसी कार्य में लगता है, जिसका वह विचार करता है इसलिए, योगिक क्रियाओं के माध्यम से, मन को शांत करने के उपाय बताए गए हैं जिन्हें, योगासन कहा जाता है| योगासन कई प्रकार के होते हैं, जिनका उल्लेख प्राचीन किताबों में मिलता है| यदि योग का वास्तविक महत्व समझ लिया जाए तो, निश्चित ही मानव जीवन आनंद से चहक उठेगा लेकिन, आज अधिकतर लोग योग का उपयोग, केवल बाहरी तल पर, अपने सांसारिक कार्यों को प्रगति देने के लिए कर रहे हैं जिससे, मनुष्य अपने जीवन की यथार्थता से वंचित रह गया और यही, मनुष्य के दुखों का कारण है| आगे चलकर इसका स्पष्टीकरण किया गया|

क्या योग से कुछ होगा?

क्या योग से कुछ होगाः Will yoga do anything?
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जिस भांति का योग मानव समाज में प्रचलित है उससे, केवल शारीरिक स्तर पर लाभ प्राप्त किया जा सकता है| कुछ लोग अपने व्यापार या नौकरी में ध्यान केंद्रित करने के लिए, योगासन प्रक्रियाएं अपनाते हैं| प्रारम्भिक दिनों में उन्हें सकारात्मक परिणाम भी दिखाई देते हैं किंतु, समय के साथ फिर वही निराशाजनक जीवन, मन के उत्साह को निष्क्रिय कर देता है जिससे, मनुष्य अवसाद से घिर जाता है| योग जीवन की ऊर्जा है जिसका, उपयोग आंतरिक सत्यता को प्रकाशित करने के लिए किया जाना चाहिए| मनुष्य अपने जीवन में कई उत्तरदायित्व निभाता है किंतु, उसका कोई भी कार्य उसे संतुष्टि नहीं देता इसलिए, योग के माध्यम से किसी ऐसे अर्थपूर्ण उद्देश्य से जुड़ना चाहिए, जिसका संबंध मनुष्य के अहंकार से न हो, जिसे कोई परिवर्तित न कर सके, जिसमें निजी स्वार्थ न छिपे हों और जो, मृत्युपर्यंत भी अमरता को प्राप्त हो सके, वही जुड़ने योग्य कर्म है और इसे ही योग कहते हैं|

अष्टांग योग क्या हैः

अष्टांग योग क्या हैः What is Ashtanga Yoga?
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आठ अंगों के यौगिक मिश्रण को, अष्टांग योग कहा जाता है| अष्टांग योग का उद्देश्य मन की शुद्धता से हैं जिसमें, उपयोग की जाने वाली विधियों के नाम- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं| यम का अर्थ निषेधात्मक प्रक्रियाओं से है अर्थात जीवन में क्या नहीं करना चाहिए, इसे यम के अंतर्गत बताया गया है| इसके विपरीत नियम का आशय, करने योग्य कार्यों से है| आसान में, शारीरिक क्रियाओं का उल्लेख मिलता है| प्राणायाम, श्वसन क्रियाओं का वाहक है| प्रत्याहार के अंतर्गत, ग्रहण करने योग्य विषयवस्तु का वर्णन किया गया है| यहाँ इन्द्रियों के माध्यम से, किये जाने योग्य भोग को, नियंत्रित करने का सिद्धान्त दिया गया है| धारण करने योग्य विचार के साथ, सत्य में ध्यान केंद्रित करना और अंततः समाधि को प्राप्त कर लेना संपूर्ण योग फल है| यहाँ समाधि का आशय, शरीर त्यागने से नहीं बल्कि, अपने अहंकार के विघटन से है जहाँ “मैं” भाव विलुप्त हो जाता है और आत्मा तत्व केन्द्रित हो जाता है| अष्टांग योग का स्पष्ट विवरण, पतंजलि योग सूत्र में देखने को मिलता है|

योग से क्या हानि है?

योग से क्या हानि हैः What are the harms of yoga?
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योग यदि शारीरिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है तो, निश्चित ही यह हानिकारक है| वस्तुतः योग देहभाव न्यूनतम करने की प्रभावी प्रक्रिया है किंतु, जब उसका उपयोग शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया जाने लगे तो, भला मन को शांति कैसे प्राप्त होगी| योग तो पूरे जीवन को चुनौती देने का कार्य है अर्थात जैसा जीवन चल रहा है, जो आप कर रहे हैं, उसका आकलन करना तथा जो अनावश्यक है, उसे हटाते जाना ताकि, उच्चतम से जुड़ा जा सके| जब तक मन की शुद्धता न की जाए तब तक, किसी नए उद्देश्य से संयोजित नहीं हुआ जा सकता| अतः योग को शारीरिक न मानकर, आध्यात्मिक मानना चाहिए| तभी योग की महिमा उजागर होगी और इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकेगा| शरीर कितना भी बलवान बना लिया जाए, एक न एक दिन, वह छोड़कर चला ही जाता है इसलिए, योग के वास्तविक अर्थों को समझना होगा जिससे, शेष जीवन आनंदित किया जा सके|

योग शक्ति कैसे प्राप्त करें?

योग शक्ति कैसे प्राप्त करें: How to get Yoga Shakti?
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मनुष्य पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान जीव है फिर भी, वह अपनी वास्तविक शक्ति नहीं पहचानता| एक साधारण मनुष्य, अपने जीवन में अधिक समय दुख में ही व्यतीत करता है| जिसका मुख्य कारण, शरीर केंद्रित जीवन शैली है अर्थात जो मनुष्य, अपने शारीरिक पहचान से जुड़े विषय वस्तुओं को महत्व देता है वह, निश्चित ही निराशाजनक जीवन प्राप्त करता है हालाँकि, अपवाद स्वरूप मूढ़ व्यक्तियों के जीवन में, दुख प्रदर्शित नहीं होता| ऐसे लोग केवल, शारीरिक कष्ट को ही दुख समझते हैं किंतु, एक तीसरे तरह का व्यक्तित्व भी है जो, सांसारिक क्षणभंगुरता से पूर्णता अवगत होता है| वह किसी व्यक्ति या वस्तु के मोह में नहीं उलझता| उसके जीवन का उद्देश्य स्वार्थ से नहीं बल्कि, आंतरिक चेतना से निर्धारित होता है| वही परमात्मा से जुड़कर योगशक्ति का अनुगमन कर सकता है|

योग का इतिहास बहुत पुराना रहा है किंतु, शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से योग करने का चलन, समय के साथ साथ संशोधित किया गया है| मनुष्य अपने वर्तमान के अनुसार, अपनी संस्कृति बदलता रहता है फलस्वरूप, प्राचीन ग्रंथ मानव अहंकार की भेंट चढ़ जाते हैं और कई बार, इससे अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है जिससे, नकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं इसलिए, आध्यात्मिक ज्ञान को वेदों और उपनिषदों से ही जानने का प्रयत्न करना चाहिए| भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने, अर्जुन को निष्काम कर्मयोग के बारे में बताया था जिसे, बिना कामना के किये जाने वाले कार्यों से प्रदर्शित किया जाता है| निष्काम कर्मयोगी अपेक्षाओं से विलग रह कर, सत्य में समर्पित हो जाता है| इसे ही योग कहा जाता है| भक्ति में डूबने वाला मनुष्य, भक्तियोग मार्गी समझा जाता है| मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम, भक्तियोग का श्रेष्ठतम उदाहरण है| अतः स्वार्थ को पीछे रखकर, पूर्वाग्रह रहित, सत्य समर्पित नवीन विचारधारा ही, मनुष्य का जीवन चिंताओं से मुक्त कर सकती है जिसे, योगफल कहना श्रेयस्कर है|

 

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