परिवार (parivar explained)

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परिवार (parivar explained in hindi):

परिवार तो पशु पक्षियों का भी होता है लेकिन, मानव समाज द्वारा बनाया हुआ परिवार, सैद्धांतिक मूल्य निहित होता है| जहाँ कुछ परंपराओं के साथ, रिश्तों की डोर बाँधी जाती है| सभी परिवारों में एक मुखिया होता है जो, अपने अनुसार आवश्यक निर्णय लेता है| मुख्य रूप से माँ से संबंधित रिश्तेदारों को, परिवार कहा जाता है| किसी भी मनुष्य के लिए, उसकी माँ का रिश्ता प्रथम होता है जिसके आधार, पर मनुष्य को उसकी पहचान मिलती है और उसी पहचान से मिलकर, बने बंधन ही परिवार बन जाते हैं| परिवार मनुष्य की शक्ति भी बन सकता है और दुर्बलता भी, अंतर केवल संबंधों का है अर्थात एक व्यक्ति, अपने सगे संबंधियों को, किस दृष्टि से देखता है, यही बात तय करती है कि, उसके जीवन में सुख होंगे या दुख| आपने सुना भी होगा, दृष्टि बदलिए दृष्टिकोण बदल जाएगा| वस्तुतः किसी भी विषय वस्तु को, देखने के लिए भले ही नेत्रों की आवश्यकता हो लेकिन, उसे समझने के लिए, विवेक होना आवश्यक होता है| विषयों को देखने मात्र से, आप रंगों का विभाजन समझ सकते हैं लेकिन, रंगों का संयोजन नियम समझना, कठिन हो सकता है| यदि आप शहद देखते हैं तो, उसे खाने से पहले उसके बारे में पता होना अनिवार्य है, उसी प्रकार अपने आस पास उपस्थित, लोगों को देखने की दृष्टि, मोह रहित होनी चाहिए| मनुष्य की बुद्धिमत्ता का पता तभी चलता है जब, वह सांसारिक विषय वस्तुओं के साथ, स्वयं से भी भली भाँति परिचित हो| यदि मनुष्य अपने आप को ही नहीं समझता तो, वह कैसे बता सकता है कि, उसके लिए कौन सा व्यक्ति हितकर है और जो लोग स्वयं को जानने का दावा करते हैं, वह कदाचित् भूल जाते हैं कि, इतने महान वेदों और दर्शन शास्त्रों की रचना, केवल आत्मज्ञान के लिए ही की गई थी ताकि, मनुष्य को वह दृष्टि प्राप्त हो जिससे, वह संसार को समझ सके क्योंकि, संसार को समझे बिना स्वयं को नहीं समझा जा सकता इसलिए, वैज्ञानिक शिक्षा के साथ अध्यात्मिक शिक्षा भी, अति आवश्यक है| प्रत्येक मनुष्य को विज्ञान के साथ साथ, अपना ज्ञान होना अनिवार्य होगा हालाँकि, परिवार के सभी सदस्यों को, एक दिशा में ले जाना असंभव है, अगर हो पाता तो, कुरुक्षेत्र जैसे महायुद्ध की आवश्यकता ही क्या पड़ती है| पारिवारिक मूल्यों को समझने के लिए, भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा, मानव जीवन का उच्चतम उल्लेख मिलता है जिसे, निम्नलिखित प्रश्नों के द्वारा समझने का प्रयत्न करेंगे|

  1. परिवार क्या है?
  2. परिवार क्यों टूटता है?
  3. परिवार कैसे चलाएं?
  4. परिवार का मुखिया कैसा होना चाहिए?
  5. परिवार को खुश कैसे रखें?
  6. आदर्श परिवार किसे कहते हैं?
पारिवारिक सदस्यों के साथ विभिन्न संबंध: Various relationships with family members?
Image by qwertygo from Pixabay

किसी व्यक्ति के, अपने पारिवारिक सदस्यों के साथ विभिन्न संबंध होते हैं| अधिकतर लोग परम्पराओं के आधार पर, परिवार बनाते हैं किंतु, कुछ ऐसे लोग भी हैं जो, स्वेच्छा से अपने परिवारजन का चुनाव करते हैं जहाँ, परंपराओं के परे जाकर भी, रिश्तों का निर्माण किया जाता है| एक मनुष्य के लिए, परिवार के बिना जीना संभव है या नहीं, इस बात पर लोगों के दोहरे विचार है| कुछ लोगों के लिए, परिवार सबसे प्रमुख होता है और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो, संसार को प्राथमिकता देते हैं लेकिन, आध्यात्मिक मार्ग के अनुसार, यह दोनों ही अज्ञान माने जाते हैं| किसी मनुष्य के लिए, केवल सत्य ही प्रमुख होता है और जो व्यक्ति, अपने चित्त में सत्य स्थापित कर लेता है उसे, अपने परिवार को समझने की क्षमता प्राप्त हो जाती है| किंतु, कैसे? आइए जानते हैं|

परिवार क्या है?

परिवार क्या हैः what is a family?
Image by : Flickr

सांसारिक दृष्टिकोण से परिवार जन्म से जुड़े संबंधियों का एक समूह होता है जिसमे, सांप्रदायिक मूल्य निहित होते हैं| परिवार में दो या दो से अधिक सदस्य होते हैं| सृष्टि के विकास के लिए, स्त्री और पुरुष के संबंधों की अनिवार्यता, किसी से छुपी नहीं है लेकिन, क्या वास्तव में जिस दृष्टिकोण से हम, कुछ लोगों को अपना परिवार कहते हैं, वह उचित है? परिवार महत्वपूर्ण तभी होता है जब, वह मनुष्य को मानवता का ज्ञान दे सके और उसके जीवन में प्रकाश की अनुवृत्ति हो| वस्तुतः परिवार ही वह प्रारम्भ है जहाँ, एक मनुष्य रिश्तों का उपयोग समझता है| परिवार के अंतर्गत पति पत्नी और बच्चे आते हैं किंतु, जब बात संयुक्त परिवार की हो तो, आस पास के सगे संबंधियों को भी परिवार में सम्मिलित किया जाता है| हालाँकि, मानव समाज का परिवार स्वार्थ की नींव पर खड़ा होता है जहां, एक पिता अपने बच्चे की परवरिश, अपने बुढ़ापे के लिए करता है न कि, बच्चे की श्रेष्टता के लिए| एक पत्नी अपने पति का सम्मान तभी करती है जब, वह उसका पालन पोषण करने योग्य हो| एक बेटा अपने पिता को तभी प्रेम करता है जब वे, उसकी आवश्यकताएं पूरी कर सकें और सगे संबंधी भी, तब तक ही रिश्ता निभाते हैं जब तक, उनका स्वार्थ बना है| अतः वास्तविक परिवार वही है, जिसके साथ रहते ही, जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ता हो| जिनकी संगत से मन, दुख मुक्त हो सके| जिनके साथ होते ही, किसी विषय वस्तु की कामना न बचे और सबसे प्रमुख, जो सत्य के समर्थक हों, वही परिवार कहलाने योग्य हैं|

परिवार क्यों टूटता है?

परिवार क्यों टूटता हैः Why do families break up?
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किसी भी सम्बन्ध को जुड़े रहने के लिए, एक सार्वभौमिक बिंदु की आवश्यकता होती है तभी, वह बंधन सत्य निहित होते हैं| संसार में सभी व्यक्तियों का निजी स्वार्थ होता है लेकिन, उससे परे कोई ऐसा विषय आवश्यक है जो, सभी के लिए महत्वपूर्ण हो तभी, परिवार जुड़ा रह सकता है| प्राचीन काल से ही, मानव समाज में एकता बनाए रखने के लिए, धर्म का अनुगमन किया जाता है किंतु, मनुष्यों के अहंकार ने, उसमें भी भेद ढूँढ लिए और आज कई लोगों के लिए, धर्म अविश्वसनीय मार्ग बन चुका है और जो धर्म पर विश्वास भी करते हैं, धर्म उनके लिए बस, अपने स्वार्थ पूर्ति का माध्यम बन कर रह गया है| आज एक सहज, मनोकामना मुक्त धार्मिक व्यक्ति मिलना दुर्लभ है| सांसारिक विचारों के अनुसार, धर्म को विश्व एकता का सबसे बड़ा शत्रु भी माना जाता है लेकिन, यदि बात परिवारों की जाए तो, पारिवारिक एकत्व भंग होने का कारण, मनुष्यों की अज्ञानता होती है जहाँ, बचपन से बच्चे को सांसारिक विषय वस्तुओं का महत्व बताया जाता है किंतु, उसके जीवन का अर्थ उसे नहीं पता होता| अतः किसी भी मनुष्य के जीवन में, सांसारिक विषयों का आकर्षण तीव्र होता है लेकिन, किसी भी विषय पर स्थिरता प्राप्त नहीं होती| जैसा कि, आप जानते हैं, संसार में उपस्थित विषय वस्तु लंबे समय तक, यथास्थिति में नहीं रह पाते जिससे, मनुष्य के रिश्ते बदलते रहते हैं| दिखावे के लिए, भले ही कोई परिवार से जुड़ा हो किंतु, आंतरिक रूप से अलगाव पैदा हो जाता है| उदाहरण के तौर पर, माँ बाप अपने बेटे को सुख सुविधाओं के साथ बड़ा करते हैं लेकिन, युवा होते ही, वह किसी लड़की से आकर्षित होकर, माँ बाप को पूरी तरह भूल सकता है| अब यह कैसे हुआ? क्योंकि, प्रेम में तो कोई कमी नहीं की गई थी| वस्तुतः मनुष्य को, अपने स्वार्थ पूर्ति योग्य विषय वस्तु, जब भी प्राप्त होती है वह, उसे प्राप्त करना चाहता है किंतु, यदि परिवार ही बाधक बने तो, विरोधाभासी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है| यहाँ अंतर केवल प्राथमिकता का होता है अर्थात यदि बचपन से सभी को सिखाया जाता, धन दौलत या कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि, पूरी सृष्टि एक समान हैं, यहाँ भेद करना व्यर्थ है अतः सभी को एक समान देखना चाहिए और सत्य को उच्चतम स्थान पर रखकर ही जीवन के निर्णय किए जाने चाहिए तो कदाचित्, परिस्थितियां कुछ और ही होतीं| यही पारिवारिक एकता का मंत्र है|

परिवार कैसे चलाएं?

परिवार कैसे चलाएं: How to run a family?
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प्राथमिक तौर पर परिवार चलाने के लिए, धन की आवश्यकता होती है लेकिन, परिवार के सभी सदस्यों को अच्छा नागरिक बनाने के लिए, शिक्षा का होना अनिवार्य है| किसी भी व्यक्ति को विवाह तभी करना चाहिए, जब वह अपना परिवार चलाने योग्य हो| वस्तुतः परिवार में जन्म लेने वाला, कोई भी बच्चा बड़े होकर देश का नागरिक बनता है और किसी व्यक्ति की घरेलू परवरिश, यह तय करती है कि, व्यक्ति परिवार के लिए संपत्ति है या बोझ और जो, परिवार के लिए उपयोगी होगा, वह देश के लिए बोझ नही हो सकता| परिवार में रहने वाले, सभी सदस्यों के बीच प्रेम होना आवश्यक है किंतु, आज परिवारों के बीच स्वार्थ की अधिकता पायी जाती है जहाँ, सांसारिक विषय जीवन की व्यस्तता बन जाते हैं और परिवार परंपरागत प्रतीक, बनकर रह गए हैं| बिना ज्ञान के, प्रेम कैसे प्रकट होगा? आपने देखा होगा, विज्ञान के बदलते युग ने, मनुष्य का जीवन मुक्त करने के बजाए, व्यस्त कर दिया है जिससे, मानसिक रोगियों की संख्या, निरंतर बढ़ रही है| पारिवारिक सौहार्द बढ़ाने के लिए, बचपन से ही सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ाना चाहिए| जिसका संबंध शारीरिक न हों कर, ज्ञान से उत्पन्न हो अर्थात परिवार सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए| परिवार में सत्य उद्धृत कर्म का पाठ अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि, जो व्यक्ति संपूर्ण सृष्टि लिए अच्छा है, केवल वही परिवार के लिए भी अच्छा होगा|

परिवार का मुखिया कैसा होना चाहिए?

परिवार का मुखिया कैसा होना चाहिएः How should the head of the family be?
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किसी भी समूह का प्रतिनिधित्व करने वाला मनुष्य, निःस्वार्थ चित्त होना चाहिए तभी, वह एक सही नेतृत्व कर सकेगा| किसी भी राज्य की सेना यदि, अपने राजा में स्वार्थ की अधिकता देखती है तो, उसका सम्मान करना छोड़ देती है और सम्मान हटते ही, विरोध उत्पन्न होना स्वाभाविक है| वस्तुतः ऊपरी तौर पर भले ही, स्वार्थी मनुष्य का नेतृत्व स्वीकार कर लिया जाए लेकिन, उसके पारिवारिक वर्चस्व की आयु लंबी नहीं होती अर्थात एक निश्चित समय आते ही, लोग ऐसे व्यक्ति को, मुखिया से नकार देते हैं| मुखिया स्थिर बुद्धि का स्वामी ही बन सकता है जो, सामाजिक मान्यताओं से हटकर, सत्य को महत्व देता हो, क्योंकि समय के साथ चलना ही, परिवार का धर्म है इसीलिए, मुखिया रूढ़िवादी विचारधारा से विलग होना चाहिए ताकि, अच्छे परिवार से, अच्छे राष्ट्र का निर्माण किया जा सके|

परिवार को खुश कैसे रखें?

परिवार को खुश कैसे रखें: How to keep the family happy?
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मनुष्य का मूल स्वभाव शान्ति है जिसे, आनंद का परिचायक भी कहा जाता है जो, सुख दुख के ऊपर की स्थिति है वही, परिवार को खुश रखने का मंत्र भी कहलाता है| आपने अनुभव किया होगा यदि, रिश्तों के बीच मतभेद होता है तो, पारिवारिक शांति भंग हो जाती है| अतः सभी के बीच प्रेम बंधन स्थापित करने के लिए, सांसारिक विषय वस्तुओं से अधिक मूल्य, सत्य निहित विचारधारा को देना होगा| जिसके आधार पर ही, संबंधों का निर्माण किया जाना चाहिए हालाँकि, प्रत्येक मनुष्य को अपनी कही बात सच ही लगती है किंतु, वह सच नहीं होती चूँकि, सभी लोगों का अपना एक दृष्टिकोण होता है जो, बचपन से ही आस पास के वातावरण से प्राप्त होता है, धीरे धीरे वही हमारी सोच बन जाती है जिसे, हम सच मान बैठते हैं| अतः सत्य निहित दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए, दर्शनशास्त्र शिक्षा अनिवार्य होती है| दर्शनशास्त्र वह महान ग्रंथ हैं जिन्हें, आचार्यों, दार्शनिकों और ऋषि मुनियों द्वारा लिखा गया था| जिनका बोध अद्भुत ज्ञान देने वाला है जिससे, मनुष्य मोह से ऊपर उठकर, लोगों को पहचान पाता है और बिना लोगों को जाने, परिवार को खुश नहीं रखा जा सकता है| सांसारिक मनुष्यों की खुशी का, एक कारण होता है जो, कभी कभी दूसरों के लिए दुख उत्पन्न करता है| जैसे, दुर्योधन द्वारा पांडवों का राजपाट छीन लिया जाना या रावण द्वारा सीता को हर लेना उनके लिए, खुशी प्रदान करने वाला काल रहा होगा लेकिन, क्या वास्तव में वह खुशी, धर्म को केंद्र में रखकर आ रही है? इस बात का विशेष ध्यान रखना ही, परिवार के मुखिया का कर्तव्य है| जिन खुशियों से किसी और को दुख पहुँचें, ऐसी खुशियाँ नर्क का द्वार है और यह पूरे परिवार के लिए, कष्टकारी सिद्ध होंगी इसलिए, अपने परिवार के सभी सदस्यों को सच की दिशा में, बढ़ने का संदेश देना चाहिए परिणामस्वरूप पारिवारिक सदस्य, सुख दुख से भी उच्चतम स्थिति, जिसे आनंद कहते हैं वहाँ, स्थापित होंगे और फिर परिवार में, स्वार्थ का कोई स्थान नहीं बचेगा जो, परिवार में तालमेल बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है|

आदर्श परिवार किसे कहते हैं?

आदर्श परिवार किसे कहते हैं: What is called an ideal family?
Image by Gerd Altmann from Pixabay

परिवार के बीच कलह होना आम बात है किंतु, यदि आदर्श परिवार की बात की जाए तो, वहाँ जीवन के मूल्य भौतिक विषय आधारित नहीं होते बल्कि, सत्य सम्मिलित कर्म ही उनका प्राथमिक उद्देश्य होता है| आदर्श परिवार अपने स्वार्थ के लिए नहीं जीता| उसके सभी कार्य परमार्थ की दिशा में ही समर्पित होते हैं अर्थात ऐसे परिवारों में रहने वाले सदस्य, स्वतंत्र विचारधारा के होते हैं जो, किसी भी तरह की परंपराओं को, बिना परीक्षण किए धारण नहीं करते| इनका उद्देश्य अनंत होता है जो, कई सालों से निरंतर सक्रिय हैं| आदर्श परिवार में, भोग करने की कोई जगह नहीं बचती| यहाँ खुशियों का आधार, त्योहार न होकर कर्म की सार्थकता होते हैं| आदर्श परिवार का उद्देश्य, धन संचयन नहीं होता बल्कि, सत्य समर्पण कर्म के लिए, जीवन देना ही उनका एकमात्र संकल्प होता है| आदर्श परिवार पूरी सृष्टि के लिए आवश्यक है|

मनुष्य को जीवन जीने के लिए, परिवारवाद की आवश्यकता होती ही है लेकिन, वास्तविक आनंद की प्राप्ति के लिए, लोगों को प्राथमिकता देना उचित नहीं हैं क्योंकि, केवल अपने परिवार को महत्व देने से, स्वार्थी विचारधारा का जन्म होता है जिसे, हिंसा का भी सूचक माना जाता है| अतः परिवार के मुखिया को, इससे बचना चाहिए और अपने सभी सदस्यों को, जीवन की ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो, पूरी सृष्टि के लिए एक भाव रख सकें| अब यहाँ आपका सवाल होगा कि, केवल अपने परिवार का ही भला सोचने में क्या बुराई है? आइए इसे समझते हैं जो, व्यक्ति केवल अपने परिवार से प्रेम करता है, उसका प्रेम स्वार्थ है जो, यह दिखाता है कि, उसे केवल स्वयं से प्रेम है और वह अपने संबंधियों का संरक्षण, केवल अपने भोग के लिए ही करना चाहता है| यहाँ तक तो ठीक था किंतु, जब यही विचारधारा परिवार के सभी सदस्यों को ग्रसित करती है तो, सभी विभिन्न दिशाओं की ओर आकर्षित होते हैं परिणामस्वरूप परिवारिक एकता भंग हो जाती है चूँकि, सबके निजी स्वार्थ हैं और उनकी पूर्ति ही मनुष्य के जीवन का उद्देश्य हैं किंतु, एक ज्ञानी मनुष्य, अपने शारीरिक तल से उत्पन्न हुए उन्मादों की पूर्ति के लिए, समर्पित नहीं होता| उसका कर्म सत्य को केंद्र में रखकर, मानव उत्थान की दिशा में बढता है जो, मनुष्य संपूर्ण जगत को, अपने परिवार के रूप में देखता है उसे, अपने जीवन का श्रेष्ठतम आनंद प्राप्त होता है फिर चाहे, कोई इस दुनिया में रहे या जाए, सभी दुख एक समान हो जाते हैं| वही स्थिति परमानन्द कहलाती है|

 

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