आदत (aadat explained in hindi):
आदत या लत एक ऐसी स्थिति है जहाँ, मनुष्य का मन भौतिक विषय वस्तुओं से, अज्ञानवश जुड़ जाता है| वही लगाव मनुष्य के सुख और दुख का कारण भी बनता हैं| आदत छुड़ाने के लिए लोग, किसी भी सीमा तक जाने को तैयार होते हैं किंतु, फिर भी उनकी आदत नहीं छूटती और क्या, एक आदत छूट जाने से, यह माना जा सकता है कि, आगे किसी और की आदत न हो? वस्तुतः मनुष्य केवल उसी कार्य को अपनी आदत बनाता है जिससे, उसे मन की तृप्ति मिलती हो और जिन सांसारिक वस्तुओं से, मन का आकर्षण बढ़ा रहा हो| उसके सापेक्ष, मानव पहचान कही जाएगी| जैसे, यदि किसी खिलौने को देख कर आकर्षण होता है तो, बचपन का भाव या व्यापारिक उद्देश्य हो सकता है| यदि खाने को देखकर मुँह में पानी आ रहा है तो, निश्चित ही भूख लगी होगी अतः कोई भी व्यक्ति, जो होगा, उसकी पूरक विषयवस्तु, उसकी आदत बन जाएगी| आपने विद्यार्थियों में अवश्य देखा होगा जहाँ, कुछ को पढ़ने में सुख मिलता है और कुछ लोगों को, पढ़ाई से घृणा होती है| अंतर केवल अपनी पहचान का है| शिक्षा से प्रेम करने वाला, अपने आपको विद्यार्थी समझ रहा है और शिक्षा से दूर भागने वाले की आंतरिक पहचान, बदल चुकी है या तो, स्त्री प्रेमी पुरूष होगा या किसी का दोस्त या व्यक्तिगत अहंकार लेकर, स्वयं को कुछ और ही मान कर, उसी के सापेक्ष आकर्षित होगा| अपनी आदत को जानना एक रहस्य है जिसे, कुछ प्रश्नों से समझेंगे|
- आदत क्या है?
- आदत कैसे बदले?
- अच्छी आदत क्या है?
- बुरी आदत क्या है?
- स्वयं पर नियंत्रण कैसे करे?

कोई भी आदत न तो अच्छी होती है और न बुरी, यह तो मानव जीवन पर उसका प्रभाव ही बता सकता है अर्थात पहले से, यह नहीं कहा जा सकता कि, यह आदत बुरी है क्योंकि, हो सकता है उसी आदत से ही, उस व्यक्ति के जीवन में प्रकाश बढ़ रहा हो वस्तुतः सारा संसार माया है जो, अपना रूप बदलता है किंतु, उसे पहचानने के लिए, दिव्यदृष्टि का होना अनिवार्य है| दिव्यदृष्टि अर्थात वह ज्ञान जिससे, अपनी आत्मा को धूमिल होने से बचाया जा सके| संसार की कोई भी धारणा या मान्यता हटाकर ही, अपनी आदतों को समझा जा सकेगा| शेर के लिए माँस, गाय के लिए घास होती है| उसी प्रकार, हम मनुष्य भी शारीरिक तौर पर भले ही समान हो, लेकिन आंतरिक चेतना विभिन्न है| एक पूर्ण चेतन मनुष्य की तुलना में, सांसारिक व्यक्ति पशु ही होता है जिसे, अच्छाई और बुराई की शिक्षा देकर ही डराया जा सकता है किंतु, एक ज्ञानी मनुष्य संसार की किसी भी वस्तु को, अमृत स्वरूप ही परिवर्तित करता है या विष समझ कर, त्याग देता है| जिस प्रकार चिटियाँ, कंकड़ के बीच शक्कर के दाने चुन लेती है उसी प्रकार, चेतन मन संसार में से अपने लिए, उपयुक्त विषय वस्तुओं का चुनाव कर लेता है जिसमें, वह पूर्व निर्धारित मान्यताओं पर विश्वास नहीं करता| क्या अच्छा है और क्या बुरा? यह, उसके आत्मज्ञान की समझ होती है न कि, उसके स्वार्थी चित्त से उठी वासना| कोई भी विषय, पूर्ण ज्ञान के साथ ही अपनाना चाहिए अन्यथा बिना पहचानें, केवल आकर्षण से संबंध बनाना, दुखदायी होगा| निम्नलिखित बिंदुओं में इसका स्पष्टीकरण किया गया है|
आदत क्या है?

मानव शरीर की प्रतिरूप निरंतरता, आदत कही जाती है| आदत एक मानसिक स्थिती है, जिसकी निरन्तरता से मानव जीवन प्रभावित होता है| हालाँकि, आदत कोई समस्या नहीं| वस्तुतः कुछ बातें शरीर के लिए उपयोगी होती हैं और कुछ मन के लिए लेकिन, जब स्वयं को पहचानने बिना, कोई अपरिचित विषय मन से जुड़ता है तो, वह दुख का कारण बन जाता है जिसे, बुरी आदत के रूप में देखा जा सकता है| प्रतिदिन नहाना, मनुष्य के लिए एक अच्छी आदत है किंतु, जब तक वह शरीर को स्वच्छ करने के लिए है लेकिन, एक रोगी व्यक्ति के लिए, नहाना हानिकारक हो सकता है| अब यदि उसे नहाने की आदत है तो, वह उसके दुख का कारण बन जाएगी| इसी प्रकार स्थिति, समय और संयोग से ही आदतों का निर्माण होता है और मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव से ही, आदतों का मूल्यांकन किया जाता है|
आदत कैसे बदले?

कोई भी आदत, मानव व्यक्तिगत पहचान से जुड़ी होती है| जिसका संबंध मानवीय मस्तिष्क से होता है और मन अतीत की सूचनाओं का प्रतिबिम्ब है जिसे, आत्मिक ज्ञान से ही निर्मल किया जा सकता है| मनुष्य अपनी आदतों से परेशान नहीं होता बल्कि, आदतन मिलने वाले दुख ही, उसे प्रभावित करते हैं| कुछ लोग, अपनी आदतों पर गर्व का अनुभव करते हैं और कुछ हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं, अंतर केवल बोध का है अर्थात स्वयं को जानने वाला मनुष्य, अपनी आदतों से भी, भलीभाँति परिचित होता है किंतु, सांसारिक मनुष्य स्वयं को, दूसरों की दृष्टि से ही देख पाता है जैसे, किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि, आप कौन हैं? तो, वह अपने माता और पिता के द्वारा दिया हुआ नाम ही बताएगा या अपनी रोज़गार सम्बंधी पह्चान जो, उसे संसार द्वारा प्रदान की गई है| उसी प्रकार, जिन भी आदतों से मनुष्य ग्रसित है वह, बाहरी वातावरण से ही प्राप्त हुई है| जिनका समाधान बाहरी दुनिया में प्राप्त नहीं किया जा सकता| कहने का आशय कि, एक आदत को दूसरी आदत से बदलने का विचार, दुखदायी हो सकता है| मनुष्य को आदतों से मुक्त होना चाहिए| आदत एक रूढ़िवादी विचारधारा है जो, मनुष्य का बंधन बन जातीं हैं| विवेकपूर्ण मनुष्य ही, समय के अनुकूल चलता है हालाँकि, यह कहना आसान तो है लेकिन, आदत छुड़ाना उतना ही कठिन| वस्तुतः सांसारिक मनुष्य, देह भाव में ही जीते हैं| अतः शरीर से जुड़ी हुई आदतें, मन में समा जाती हैं जिसे, व्यक्ति अपनी पहचान बना लेता है| जैसे, कोई व्यक्ति लंबे समय से शराब का सेवन कर रहा है तो, लोग उसे शराबी कहेंगे और उनके शराबी कहने से, वह व्यक्ति अपने आपको शराबी भी मान बैठेगा जो, उसकी पहचान बन जाएगी| यहाँ समस्या शराब नहीं, व्यक्ति के विचार हैं| जो वस्तु, मनुष्य के लिए साधन होनी चाहिए उसे, साध्य बनाना मूर्खतापूर्ण है| जब यह शरीर ही मिट्टी का कण है तो, नेत्र द्वारा देखे जा रहे विषय, कितने महत्त्वपूर्ण होंगे? मनुष्य की प्राथमिकता ही उसे, किसी भी विषय से जोड़ती है| अतः अपनी प्राथमिकता सत्य के प्रति ही रखना चाहिए तभी, मन किसी भी विषय को, छोड़ने में सक्षम हो सकता है|
अच्छी आदत क्या है?

कोई भी आदत, अपने प्रभाव के कारण ही, सुख दुख की श्रेणी में आती है अर्थात जो आदत, मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करने में सहायक हो, उसे अच्छी आदत कहा जाएगा| प्रारम्भिक तौर पर, शारीरिक दृष्टिकोण से, आदतों का मूल्यांकन किया जाता है जहाँ, स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने वाले कार्यों को, अच्छी आदत के रूप में देखा गया है| जैसे- व्यायाम करना, समय से नींद या नियमित भोजन इत्यादी| हालाँकि, मनुष्य की प्रत्येक आदत जो, उसके जीवन को अंधकार से बाहर लाने में सहायता प्रदान करे, उसे व्यक्तिगत रूप से अच्छा कहा जा सकता है| इसे एक उदाहरण से समझते हैं जैसे, कोई लड़का सीधे साधे स्वभाव का है और उसे लोगों से बात करने में डर लगता है, ऐसे लड़के के लिए, अपरिचित लोगों से बात करना, अच्छी आदत मानी जाएगी क्योंकि, वह उसके व्यक्तित्व को ऊँचे उठने में सहायता प्रदान कर रही है किंतु, यदि कोई लड़का निरुद्देश्य लोगों के साथ घूमने, फिरने और बात करने में ही सुख प्राप्त कर रहा हो तो, वह उसके लिए बुरी आदत होगी क्योंकि, इससे उसके जीवन में प्रकाश आने के बजाए, अंधकार की उत्पत्ति होगी| अतः स्पष्ट है, आत्मज्ञान के साथ अपनायी हुई आदतें ही, श्रेष्ठ हो सकती हैं| सभी की शारीरिक और मानसिक स्थितियाँ भिन्न होतीं हैं इसलिए, किसी आदत को सार्वजनिक तौर पर अच्छा नहीं माना जा सकता| जैसे, व्यायाम करना एक रोगी व्यक्ति के लिए, घातक हो सकता है| अतः समय, संयोग और स्थान के अनुकूल अपनायी गई आदतें हितकर होंगी|
बुरी आदत क्या है?

सांसारिक मनुष्यों के अनुसार, उनकी दिनचर्या या संस्कृति के विपरीत, कोई भी बात बुरी आदत की श्रेणी में गिनी जा सकती है| जैसे, किसी परिवार में मांस का सेवन करना निंदनीय माना गया है तो, उनके अनुसार मांसाहार करना बुरी आदत कही जाएगी| उसी प्रकार, कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें, भगवान की पूजा करना भी बुरी आदत लगती होगी| वस्तुतः यहाँ लोगों की व्यक्तिगत सोच, अच्छाई और बुराई को चिन्हित करती है और मानवीय बोध की अनुपस्थिति ही, इनकी सोच को प्रमाणित कर देती है जो, भ्रामक विचारधारा को जन्म देता है| अतः मनुष्य के जीवन में अंधकार लाने वाला प्रत्येक कार्य, बुरी आदत कहा जा सकता है| जैसे, किसी बच्चे को किताबें पढ़ने में बहुत रुचि है लेकिन, यदि वह सारा जीवन केवल पढ़ाई ही करता रहा तो, उसके जीवन की सभी संभावनाएं नष्ट हो जाएंगी| जो अंततोगत्वा, नकारात्मकता परिणाम प्रदान करेंगी जो, निश्चित ही उस लड़के के लिए बुरी आदत सिद्ध होगी|
स्वयं पर नियंत्रण कैसे करें?

सांसारिक मनुष्य, बाह्य विषय वस्तुओं से नियंत्रित होते हैं जिसमें, मनुष्य की इन्द्रियाँ, अहम भूमिका निभाती है| वस्तुतः मानव मन चंचल है जो, अपनी प्रवृत्ति के अनुसार ही, कर्म का चुनाव कर सकता है इसलिए, स्वयं पर नियंत्रण रखने के बजाए, अपने व्यक्तित्व को पहचानने का प्रयत्न करना चाहिए| कोई भी व्यक्ति, अपने मन की शांति के लिए ही, सांसारिक कार्यों से जुड़ता है किंतु, जब परिणाम विपरीत मिलने लगे तो, उनका शरीर अनियंत्रित हो जाता है जिससे, बाहरी तत्व अपने अनुसार, मन को नियंत्रित करने लगते हैं लेकिन, प्रभावित व्यक्तियों को लगता है कि, यह तो उसी ने किया है और यही बोझ उन्हें, नकारात्मकता का आभास कराने लगता है जिससे, मनुष्य का जीवन दुख से घिर जाता है| स्वयं को, किसी भी पहचान से जोड़ लेना ही बंधन है| उदाहरण के लिए, आपने अपने आपको, किसी का दोस्त मान लिया तो, अब संसार ने दोस्त के रुप में जो कर्तव्य बताए होंगे, उनका पालन करना अनिवार्य होगा| भले ही, वह आपके दुख का कारण बनें| अब यहाँ दोस्त की ख़ुशी के लिए, किसी कार्य को करना दुखदायी हो सकता है| जैसे, दुर्योधन की दोस्ती में, कर्ण को हुआ होगा इसलिए, मनुष्य को सभी तरह की पहचानों से मुक्त होना चाहिए| वह न किसी का दोस्त है, न बेटा है, न भाई है, न बहन है, न पिता है, न ही पति है और न ही, अन्य किसी तरह की पहचान जो, बाहरी लोगों द्वारा दी जा रही है, उन्हें धारण करना अज्ञान को जन्म देता है| अतः स्वयं पर नियंत्रण करने के लिए, सांसारिक पह्चान से बाहर आना ही होगा तभी, अपनी लगाम अपने हाथ आ सकती है| मनुष्य का सम्बन्ध तो, केवल उस, परमब्रह्म से है जिसने, उसकी श्वसन क्रिया नियन्त्रित की है| अगर श्री राम ने, दशरथ को अपने पिता के रूप में देखा होता तो, वह अपनी सौतेली माँ के लिए, वनवास नहीं जाते बल्कि, पिता का मोह उन्हें रोक लेता और परिणामस्वरूप रावन, मनुष्यता का सर्वनाश कर देता| इसलिए एक ज्ञानी को, पूर्ण रूप से बंधनों से मुक्त होना पड़ता है तभी, वह बाहर फैले हुए अत्याचार को देख सकेगा| अपने परिवार में, अपने स्वार्थ के लिए जीने वाले मनुष्य, समय की कठपुतली हैं जिनका, नियंत्रण बाहरी शक्तियां ही करती है|
मनुष्य का जन्म आनंद की प्राप्ति के लिए हुआ है किंतु, समस्या इस बात की है कि, आनंद सुख और दुख के ऊपर की स्थिति को कहा जाता है जिसे, सांसारिक विषय वस्तुओं के भोग से प्राप्त नहीं किया जा सकता| संसार में उपस्थित भौतिक तत्व, शारीरिक सुख तो दे सकते हैं लेकिन, वही दुख का कारण भी बनते हैं जिन्हें, मनुष्य की अज्ञानता का अंधकार देख नहीं पाता और समय आने पर, जब वही सुख व्यक्ति का दुख बनकर लौटता है तो, जीवन में पछतावा ही बचता है| सुख की कामना करना ही, दुख को जन्म देता है| अतः श्रेष्ठ मनुष्य, श्री राम की भांति, सुख दुख पर ध्यान नहीं देते बल्कि, सत्य का चुनाव कर, वनवास धारण करते हैं ताकि, उनका संघर्षपूर्ण जीवन, मानवता का उदाहरण बने| यहाँ वनवास से आशय, जंगल जाने से नहीं बल्कि, एक सार्थक कर्म के चुनाव से है| यही बुरी आदतों से दूर होने का मार्ग भी हो सकता है|